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Friday, 30 October 2015

पल


कतरा कतरा पलों को काटने का बहाना है,यादों के पिटारे को खोलना,
लेकिन कभी कभी भूल से ही सही, सोने की गुमी हुई अंगूठी सा वो पल 
वापस मिल जाता है, आँखों में मोती लिए ...

Saturday, 26 September 2015

अज़ीब इन्टरनेट की दुनिया

आश्चर्य करता हूँ,
पल भर में नज़ारा
दुनिया का देखकर
इन्टरनेट के ज़रिये.
बनते हैं जहाँ सेकड़ों रिश्ते
बस एक क्लिक पर.
आश्चर्य करता हूँ,
यह सोचकर,
8X10 के कमरे में
 बैठ कर
तन्हा होते हुए भी
मैं अपने आप को
अकेला नहीं .  पाता
अरे यकीं कीजिये
पूरा एक गाँव बसाया है मैंने
अपने सेकड़ों परिजनों
 का...
लेकिन
फिर भी यह कैसा
खालीपन.
इतना सब होते हुए भी
नहीं है
अपनापन.
सदियाँ हो गयी
किसी अपने का हाथ थामे
किसी बड़े का चरणस्पर्श किये
किसी दोस्त के गले में हाथ डाले घुमे
उन गलियों में खेले.
जो सकरी रहते हुए भी
भरपूर आत्मीयता को संजोये हुए थी 
सचमुच सदियाँ हो गयीं
सौंधी मिटटी को महसूस किये.
फूलों को देख कर
उन्ही के जैसे मुस्कुराये.
आज याद आता है
 वो नुक्कड़
जहाँ मिलता था
चाय-चिंतन का
अद्भुत संगम.
उंगलियाँ क्लिक करते करते मोटी हो गई
लेकिन भावनाएं कहीं गुम हो गई.
हज़ारों मीलों कि दूरियां
मिनटों में तो लांघ ली
लेकिन
कमरे के बहार की
कुछ फुट की दूरियां
आज थका देती हैं.
कैसी शून्यता है.
जो अखंडित सी
लगती है.
लगता है
  इस अती की कोई सीमा नहीं है.
अज़ीब इन्टरनेट की दुनिया,
शायद येही है...

Thursday, 20 August 2015

साथी


मेरे आखों की बरसात रोकने वाले-ओ साथी!
क्या पता था मुझे कि
तुम आंधी के जैसे आओगे
और ग़मों के काले बादलों को
मुझसे दूर कहीं ले जाओगे.
जैसे ही हाथ पकड़ोगे तुम मेरा
क्या पता था मुझे कि
तुम मेरे दुखों की दीवार को भी
एक झटके में ढहा जाओगे.
मेरे सलवटों से भरे
कोरे जीवन के पन्नों में,
रंग भर के-ओ साथी !
क्या पता था मुझे कि
तुम मेरे रंगरेज़ बन जाओगे.
क्या पता था मुझे कि- ओ साथी!
अंधरे मेरे मन के गलियारों में
पलक झपकते ही,
तुम अनेक उज्ज्वल दिए जला जाओगे.
 तुम अपने स्वर से
सूने-सूखे पड़े मेरे मन के आंगन में
राग मल्हार की बरखा कर जाओगे.
और मेरे आश्चर्य की सीमा को भी
एक झटके में लांघ जाओगे.
 मेरा सूनापन दूर करके
मुझे अपना
 ऋणी बनाने वाले-ओ साथी!
क्या तुम दुर्गम जीवन पथ में
मेरे हमराही भी बन जाओगे ?
क्या तुम- ओ साथी!
अधूरे पड़े मेरे जीवन
अपने साथ से पूरा करने का साहस दिखा पाओगे?
क्या तुम मेरा प्रेम निवेदन स्वीकार कर पाओगे ?
जावाब का इंतज़ार रहेगा मुझे...







Saturday, 17 January 2015

दर्द



तेरे दुःख – दर्द की छाया करती मुझपर भी असर
ऐसा,
हो जाती दवा-दुआ बेअसर.
तेरे गालों पर अश्क भिगो देते मेरे दिल के भावों को
ऐसे
जैसे बिन मौसम बरखा करती है ख़राब खेतों की फसलों को.
सहसा साहस को भूल मेरी आखों भी देती सांत्वना तुझे
और
अचानक रुंधे हुए अल्फाज़ मेरे, 
तेरे लिए करह उठते कह उठते
कि

तेरा दर्द सिर्फ तेरा नहीं है, तू अकेला नहीं है...

Friday, 12 December 2014

आकृति


जब मैंने देखा तुम्हे
विचोरों का पुनिन्दा उड़ा
लगा जैसे
तुम्हारे रूप में
समा गई है सम्पूर्ण सृष्टि
कुछ पलों के लिए लगा जैसे
मिल गई मुझे दिव्य-दृष्टि
और ऊर्जा से भर गई मेरी प्रकृति
चाहा मैंने कि
उकेर लूं मैं तुम्हारी आकृति
कागज़ के पन्नों पर
जो है कर रही भ्रमण
मेरे मन के आंगन में
कुछ पल के लिए
तोड़ दिया मैंने कटु यथार्त से
अपना रिश्ता
जिससे साफ़ हो गया
 मेरे और कृति के बीच का रास्ता
जैसे-जैसे लकीरें उकेरता गया
बैचेन मन और विचलित होता गया
पशोपेश जद्दोजहद के बाद
पूर्ण हुई अमर अमूर्त कृति
लगा जैसे जब तक रहेगी सृष्टि
अमर रहेगी तुम्हारी आकृति ।

Saturday, 11 May 2013

माँ


भाग्यविधाता के सामने खड़ा हुआ मैं
अपनी बारी आने के इंतज़ार में
 सोच रहा
अगले जन्म के लिए
क्या वरदान की मांग करूं मैं?
क्या मांग लूं मैं
चिरंजीव होने का
वरदान मैं ?
या मांग लूं
अजातशत्रु होने का
वरदान मैं ?
क्या मांग लूं
सम्पूर्ण पृथ्वी का राज्य मैं?
या मांग लूं मैं
कुबेर से ज्यादा धन?

क्या फिर भी भर पायेगा मेरा मन ?
आई जब मेरी बारी
माँगा मैंने
एक आँचल
एक प्रेम का बंधन
एक गुरु मार्गदर्शक

विधातापुरुष ने दिया वरदान
पहली दफ़ा जब खोलेगा तू आँखे
देखेगा जिसका तू चेहरा
जिसको पुकारेगा तू पहली बार
वोह होगा तेरा वरदान...
पलखें खोली जब मैंने
देखा एक सोम्य चेहरा पहली बार
सहसा एक आंसू बह आया
और रूंधे हुए कंठ से
निकला
“माँ”