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Saturday, 17 January 2015

दर्द



तेरे दुःख – दर्द की छाया करती मुझपर भी असर
ऐसा,
हो जाती दवा-दुआ बेअसर.
तेरे गालों पर अश्क भिगो देते मेरे दिल के भावों को
ऐसे
जैसे बिन मौसम बरखा करती है ख़राब खेतों की फसलों को.
सहसा साहस को भूल मेरी आखों भी देती सांत्वना तुझे
और
अचानक रुंधे हुए अल्फाज़ मेरे, 
तेरे लिए करह उठते कह उठते
कि

तेरा दर्द सिर्फ तेरा नहीं है, तू अकेला नहीं है...

Friday, 12 December 2014

आकृति


जब मैंने देखा तुम्हे
विचोरों का पुनिन्दा उड़ा
लगा जैसे
तुम्हारे रूप में
समा गई है सम्पूर्ण सृष्टि
कुछ पलों के लिए लगा जैसे
मिल गई मुझे दिव्य-दृष्टि
और ऊर्जा से भर गई मेरी प्रकृति
चाहा मैंने कि
उकेर लूं मैं तुम्हारी आकृति
कागज़ के पन्नों पर
जो है कर रही भ्रमण
मेरे मन के आंगन में
कुछ पल के लिए
तोड़ दिया मैंने कटु यथार्त से
अपना रिश्ता
जिससे साफ़ हो गया
 मेरे और कृति के बीच का रास्ता
जैसे-जैसे लकीरें उकेरता गया
बैचेन मन और विचलित होता गया
पशोपेश जद्दोजहद के बाद
पूर्ण हुई अमर अमूर्त कृति
लगा जैसे जब तक रहेगी सृष्टि
अमर रहेगी तुम्हारी आकृति ।

Saturday, 11 May 2013

माँ


भाग्यविधाता के सामने खड़ा हुआ मैं
अपनी बारी आने के इंतज़ार में
 सोच रहा
अगले जन्म के लिए
क्या वरदान की मांग करूं मैं?
क्या मांग लूं मैं
चिरंजीव होने का
वरदान मैं ?
या मांग लूं
अजातशत्रु होने का
वरदान मैं ?
क्या मांग लूं
सम्पूर्ण पृथ्वी का राज्य मैं?
या मांग लूं मैं
कुबेर से ज्यादा धन?

क्या फिर भी भर पायेगा मेरा मन ?
आई जब मेरी बारी
माँगा मैंने
एक आँचल
एक प्रेम का बंधन
एक गुरु मार्गदर्शक

विधातापुरुष ने दिया वरदान
पहली दफ़ा जब खोलेगा तू आँखे
देखेगा जिसका तू चेहरा
जिसको पुकारेगा तू पहली बार
वोह होगा तेरा वरदान...
पलखें खोली जब मैंने
देखा एक सोम्य चेहरा पहली बार
सहसा एक आंसू बह आया
और रूंधे हुए कंठ से
निकला
“माँ” 

Saturday, 4 May 2013

अंकुर



अंकुर

चक्रव्यूह के निकट खड़ा
तू क्या सोच रहा ?
जब धर्म टक-टकी लगाये तुझे देख रहा,
फिर क्यों तेरा शरीर थर्थर कांप रहा ?
क्या यह सोचता तू
कि,
ऐसी कायरता दिखाकर बच जायेगा
अपने दायित्व से तू ?
अगर यह सही है-
तो अपने भ्रम को सींचता तू .

जैसे आलस की आड़ में
बंद कर लेता झरोंखे तू
और बंद कर लेता अपनी आँखे तू
लेकिन
पड़ती तेज़ धूप जब पलखों पर
तब तो
मजबूर हो जाग जाता न तू.


इस घडी में
बना हुआ क्यों नपुंसक तू ?
और जाना चाहता रण छोरकर तू,
तो मैं तुझे यह कह दूं कि
जा शौक-से जा तू
नहीं भी देगा साथ मेरा तू
तब भी लडूँगा अकेला मैं
यह समझ ले तू.
मुझे है भरोसा,
मुझे लड़ता देख
खुद को भी न रोक पायेगा तू
मुझे है भरोसा
धरती के गर्भ में
सच का बीज
कितना ही नीचे गडा हुआ
क्यों न हो,
धरती को चीर के
दृढ खड़ा हो जायेगा
अंकुर.

Monday, 29 April 2013

आईना और मैं

आईना और मैं

आईना भी चकित,
देखता रह गया 
की जिसकी 
आखों मैं थे 
कल रात आंसू
आज फिर
मुस्कुरा रहा
आईना भी चकित,
देखता रह गया 
की जिसके 
चेहरे पर थे 
विषाद के बादल
आज उस चेहरे पर
खिली धूप
जेसे फिर
 झूम आया बसंत
आईना भी चकित,
देखता रह गया
कि जो कलतक था
अपनों के दिए 
दर्द से कराहता हुआ
आज फिर उमंग से 
भर उठा
एसा क्या हुआ 
एक रात में
जिससे 
आईना भी  चकित 
देखता रह गया
धोखा खा बैठा और 
बोल बैठा 
यह वह नहीं है चेहरा 
जिसे मैंने कल रात देखा 


Thursday, 25 April 2013

हार मानूंगा नहीं

हार मानूंगा नहीं

एक टूटी कश्ती लेकर अकेला 
मझधार में ही सही
कातिल लहरों से लड़ जाऊँगा 
लेकिन घुटने अपने टेकुगा नहीं
अकेला घनघोर अँधेरे में
खड़ा हुआ ही सही 
लेकिन अपनी मशाल
बुझने दूंगा नहीं 
बादलों की गर्जन
कितनी ही तीव्र सही
आंधी कितनी ही तेज़ सही
लेकिन अपनी जड़े
हिलने दूंगा नहीं
जब तक 
ध्येय की प्राप्ति न हो जाये
पेड़ कितना ही छतनार सही
लेकिन थक कर चूर हो कर
आराम करूंगा नहीं.
नर हूँ
निराश मन को करूंगा नहीं
सत्य की रक्षा में
अधम के विनाश में
कर्तव्यों को पूरा करने में
छत-विछत हो जाऊँगा भले ही 
अपने बल पर उठ जाऊँगा
लेकिन पीठ दिखाकर 
भागूंगा नहीं
एक शूरवीर की तरह
वीरगति को प्राप्त 
हो जाऊँगा भले ही
लेकिन 
कायरों की तरह 
हज़ार मौतें मारूंगा नहीं
गिर कर हो जायें मेरे 
हज़ारों टुकड़े भले ही
लेकिन 
प्रत्येक टुकड़ा 
पुनः उठ कर कहेगा 
हार मानूंगा नहीं



Tuesday, 2 April 2013

अर्ध से आरंभ

अर्ध से आरंभ

जब मैं था तुम्हारे संग
मन में थी एक अजीब सी उमंग
सोचा था
रहोगे तुम मेरे मन में
जेसे वल्लरी लिपटी रहती है
एक छतनार पेड़ के संग ।
बुने थे कुछ मैंने
बुने होंगे तुमने
कुछ स्वप्न ।
लगा था
होगें हम संग
आजीवन ।
माना कुछ अभाव थे
कुछ  दूरियां भी  थी
लेकिन
क्या मिला तुम्हे
और
क्या हासिल कर पाया
मैं??
क्या पता था
शब्दों की तकरार में 
नियति अपने द्युत में
चले जा रही थी पासे
हमारे
ही
खिलाफ ।
आज
मन के संदूक को टटोल
रहा हूँ
और
देख रहा हूँ
मैं
समय है मानव से
अधिक बलशाली
क्यूंकि
वह प्रतीक्षा
करता नहीं
और रह जाती हैं
उन यादों की
ठूंठ ।
लेकिन
है जीवन
अभी भी शेष
संजोये हुए अपने स्मृति कोष
आशा है
अभी भी कर सकतें
हैं हम
अर्ध से आरंभ ।